
बीजेपी से गठबंधन तोड़ने का फैसला कर चुके हैं नीतीश कुमार! नीतीश कुमार द्वारा महागठबंधन को रातोंरात बाय-बाय कह कर एनडीए के साथ सरकार बना लेने का ढाई महीने से भी कम समय गुजरा है. इन ढाई महीनों में नीतीश को पीएम मोदी से यह चौथी बड़ी मायूसी हाथ लगी है. ये तमाम मायूसियां ऐसी कि नीतीश अपने करीबियों से भी इस दर्द को शेयर करने से कतराते होंगे. हां, इतना जरूर है कि अकेले में यकीनन वे इन मायूसियों पर खुद को कोसते होंगे. बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित पटना युनिवर्सिटी शताब्दी समारोह में नीतीश कुमार, पीएम मोदी की मौजूदगी में जिस अंदाज में भाषण दे रहे थे, वह देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति सम्मान दिखाने से ज्यादा याचना से लबरेज था. मोदी की प्रशंसा में तारीफों के पुल बांधने के बाद नीतीश ने कहा कि पहली बार जब प्रधानमंत्री यहां आये हैं तो पटना विश्वविद्यालय और राज्य के लोगों की अपेक्षाएं भी उनसे बड़ी हैं. हाथ जोड़ कर उनसे प्रार्थना करूंगा कि चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष पर प्रधानमंत्री पटना विश्वविद्यालय को सेंट्रल युनिवर्सिटी का दर्जा दे दीजिए. अगले सौ साल तक लोग याद रखेंगे कि पीयू कब केंद्रीय विश्वविद्यालय बना और किनकी मेहरबानी से बना? पटना युनिवर्सिटी के इस समारोह में जब नरेंद्र मोदी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने बड़े सलीके से ‘ना’ कह दिया. ‘ना’ कहने के लिए उन्होंने लम्बी भूमिका बांधी. लगभग चार मिनट तक की भूमिका में मोदी ने भी बदले में नीतीश की जमकर तारीफ की. वहां मौजूद लोगों के साथ बिहार और बिहारियों के योग्यता की प्रशंसा की और अंत में जो कहा, उसका अर्थ साफ था कि वह पीयू को सेंट्रल युनिवर्सिटी का दर्जा नहीं देने वाले हैं. हां, अगर पीयू में योग्यता है तो वह उन बीस युनिवर्सिटियों से प्रतियोगिता करे और दस हजार करोड़ रुपए के प्रस्तावित फंड का बड़ा हिस्सा ले सके तो ले ले. देश के प्रधानमंत्री से सार्वजनिक मंच पर नीतीश जैसे बड़े कद का मुख्यमंत्री अगर एक छोटी सी मांग करता है, तो उन्हें जर्रा बराबर भी इसका आभास नहीं होता कि पीएम उनकी मांग को ठुकरा पायेंगे. लेकिन नरेंद्र मोदी ने सलीके से उनकी मांग को ठुकरा कर उन्हें मायूस किया. हमने ऊपर जिक्र किया है कि ढाई महीने में मोदी द्वारा नीतीश को मायूस करने का यह चौथा उदाहरण है. लेकिन इन मायूसियों की कड़ी का यह अंतिम पड़ाव है या नहीं, यह बात निश्चित तौर पर नहीं कही जा सकती. लेकिन इतना तय है कि इस समारोह से मायूसी हाथ लगने के बाद वे नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति अपनी कार्यशैली और रणनीति में कुछ बदलाव करने पर जरूर गौर कर रहे होंगे. सवाल यह है कि नीतीश अब क्या करेंगे? इस सवाल का जवाब खोजने से पहले यहां जरूरी है कि हम बाकी तीन मायूसियों और उसकी पृष्ठभूमि की चर्चा करें. साथ ही उन राजनीतिक हालात का पुनर्मूल्यांकन भी करें जिसके तार इन मायूसियों से जुड़े हैं. वह 26 जुलाई 2017 की रात थी. जब नीतीश कुमार अपने तमाम विधायकों के साथ बैठक कर अचानक राजभवन कूच कर गए थे. वहां पहुंच कर उन्होंने मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया था. उस वक्त तक वह राजद-कांग्रेस वाले महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री थे. एक झटके में इस्तीफा देने के बाद, तयशुदा योजना के तहत उन्हें भाजपा गठबंधन के साथ आकर 27 जुलाई को नई सरकार का गठन करना था. इसी पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के तहत जदयू की तरफ से यह खबर मीडिया को दी गई कि शपथग्रहण समारोह में पीएम नरेंद्र मोदी भी शरीक होंगे, लेकिन वे शरीक नहीं हुए. मोदी की तरफ से नीतीश के लिए यह पहली मायूसी थी. इसके बाद मोदी द्वारा महज 30 दिनों के बाद यानी 26 अगस्त 2017 को नीतीश कुमार को बड़ा झटका हाथ लगा. प्रधानमंत्री मोदी भयावह बाढ़ का जायजा लेने बिहार आए थे. बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के हवाई सर्वेक्षण के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने आवास पर मोदी के लिए दोपहर के भोज का इंतजाम किया था. भोज की सारी तैयारियां मुकम्मल थीं, लेकिन अंतिम समय में मोदी ने उस भोज में शामिल होने से मना कर दिया था.
बीजेपी से गठबंधन तोड़ने का फैसला कर चुके है नीतीश कुमार बीजेपी को लग सकता है सबसे बड़ा झटका - YouTube |
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| People & Blogs | Upload TimePublished on 1 Dec 2017 |
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